Who is God, What is their nature, What they do and What is their usefulness

ईश्वर कौन हैं (Who is God)

इस विषय को प्राथमिकता देने एवं पहले स्थान पर रखने के पीछे का कारण यह है कि सारी सृष्टि, दृश्य -अदृश्य रचना के होने के कारणों के पीछे किसी शक्ति (ईश्वर) का होना ही है। यह विषय कौतूहलपूर्ण एवं व्यापक है। इस विषय पर व्याख्या पूर्ण नही हो सकती है या यों कहें कि इस विषय की पूर्ण व्याख्या नहीं हो सकती है। ईश्वर अथवा शक्ति का होना या न होना, इस विषय पर अनेक मत हैं परन्तु यह सर्व विदित है कि समस्त ब्रह्माण्ड में जो कुछ दृश्य या अदृश्य रचना है वह एक सर्व शक्ति सम्पन्न शक्ति के अलग-अलग अधिक अथवा शूक्ष्म अंश के रूप में विद्यमान होने के कारण ही निर्मित है। इस विषय पर सभी सहमत होंगे कि कोई न कोई परम शक्ति अथवा प्रदार्थ है जिसे विभिन्न धर्मों के लोग अपने-अपने धार्मिक नामों से सम्बोधित करते आये हैं/करते हैं। इस सत्य की खोज में लगे प्राचीन काल से लेकर वर्तमान काल तक के मनीषी और वैज्ञानिक भी ऐसी शक्ति का अहसास करते हैं। परन्तु अभी तक पूर्ण रूप से ज्ञात न हो पाने के कारण यह सब प्राकृतिक रूप से स्वतः निर्मित होने का अनुमान लोग लगाते हैं और लगा सकते हैं। 
हम सभी यह मानते हैं कि प्रकृति में जितनी भी दृश्य अथवा अदृश्य रचना हैं यह उसके द्वारा निर्मित नहीं है और यदि ऐसा मानते हैं तो हम सभी को यह स्वीकार होगा कि प्रत्येक प्रदार्थ में अथवा जीवित प्राणियों को संचालित करने में किसी प्रकार की शक्ति का होना अनिवार्य है। प्रदार्थों में भी शक्ति होती है, प्राणियों के जीवित होने के पीछे भी किसी शक्ति का होना ही है। ऐसी किसी शक्ति के न होने के कारण ही प्राणी मृत हो जाता है। इसी शक्ति को परम शक्ति की शक्ति या उसका अंश तथा उस परम शक्ति को ही “ईश्वर” कहा गया है।” 

ईश्वर का स्वरुप क्या है (How is God)

अब प्रश्न यह उठता है कि प्रत्येक प्रदार्थ अथवा प्राणियों में उस परम शक्ति की शक्ति कैसी और कितनी मात्रा में है ? क्या उसका कोई विशेष स्वरुप है ? प्रत्येक धर्म, सम्प्रदाय आदि इसी परम शक्ति को /ईश्वर को अपने-अपने तरह से व्यक्त करता है। निश्चित स्वरुप अथवा उसकी सर्व स्वीकार्यता के, कोई उसे साकार रूप में तो कोई निराकार रूप में मानता है। कोई विशाल रूप में तो कोई शूक्ष्म रुप में मानता है। इसी शक्ति (ईश्वर) को अनेक नामों की उपमा दी गई है जैसे-सर्वव्यापी, सर्वशक्तिसंम्पन्न, सर्वज्ञ आदि-आदि। इन नामों की उपमा के पीछे ऐसी ही किसी शक्ति का होना है जिसके द्वारा समस्त ब्रह्माण्ड संचालित हो रहा है। विशाल में विशाल एवं शूक्ष्म में शूक्ष्म होने के कारण शक्ति (ईश्वर) के स्वरुप की व्याख्या क्या हो सकती है ? फिर भी समझने के लिए एक छोटे उदाहरण स्वरुप प्रत्येक पुरुष अथवा स्त्री अपने जीवन काल में अपने अनेक रिश्तों (रूपों) का निर्वहन करता है।  जैसे-एक पुरुष एक पुत्र का, एक भाई का, एक पिता का तथा एक पति आदि का, ठीक उसी प्रकार एक स्त्री एक पुत्री का, एक बहन का, एक माँ का  तथा एक पत्नी आदि का।  यहाँ प्रत्येक रिश्तों में वह एक होते हुए भी भाव अलग-अलग होने के कारण अलग-अलग रूप में होता /होती है।  इसी प्रकार हम यह मान सकते हैं कि वह परम शक्ति (ईश्वर ) भी अनेक रूप में हो सकते हैं।  ठीक इसी प्रकार समझने के लिए उनके आकार अथवा मात्रा की भी एक व्याख्या हो सकती है।

ईश्वर करते क्या हैं (What  they do)-

अब प्रश्न यह उठता है कि ईश्वर करते क्या हैं ? यह कहना कि ईश्वर करते क्या हैं, उनको दी गई उपमाओं यथा -सर्वव्यापी, सर्वशक्तिसम्पन्न, सर्वज्ञ आदि-आदि के द्वारा समझने का प्रयास करते हैं कि जो सर्वज्ञ है उसे हम अपनी बुद्धि के द्वारा, जो सर्वव्यापी है उसे अपनी दृष्टि के द्वारा, जो सर्वशक्तिसम्पन्न है उसे अपनी शक्ति के द्वारा आदि-आदि से कैसे समझ सकते हैं। परन्तु फिर भी थोड़ा समझने का प्रयास करते हैं। उदाहरणार्थ- प्रत्येक पुरुष या स्त्री के मन को कोई कैसे समझ सकता है? वह वाह्यरूप में क्या करता या करती है और अन्तर्मन में क्या है ? इसी प्रकार हम उसके अच्छे-बुरे कार्यों से भी समझने का प्रयास करते हैं कि वह क्या और क्यों किसी वस्तु का सृजन करता है और क्यों किसी को नष्ट करता है? फिर विचार करते हैं कि अब यदि हम एक साधारण मनुष्य को समझने में उलझ सकते हैं तो ईश्वर को कि वो क्यों और क्या करते हैं, शायद समझना ? परन्तु फिर भी उनके अंश स्वरुप मनुष्य के कार्यों एवं विचारों से समझ कर विचार कर सकते हैं।

ईश्वर की उपयोगिता क्या है (What  is their usefulness)-

अब प्रश्न यह है की ईश्वर की उपयोगिता क्या है ? जैसा कि उपरोक्त से स्पष्ट है कि प्रत्येक प्रदार्थ एवं जीवों में शक्ति (ईश्वर) का होना ही उनकी उपयोगिता को पूर्ण रूप से व्यक्त करता है। परन्तु फिर भी एक बहुत महत्वपूर्ण उपयोगिता के बारे में कहना चाहता हूँ कि यदि हम पुनः विचार करें कि प्रत्येक प्रदार्थ अथवा प्राणियों में ऐसी कोई परम शक्ति की शूक्ष्म शक्ति है तभी उसका आस्तित्व है। उसी शक्ति के सहारे प्राणी अपना जीवन काल पूर्ण कर पाते हैं। इसी शक्ति का पूर्ण अहसास ही उसे उस शक्ति (ईश्वर) को स्वीकार करने को विवश करता है। ईश्वर को मानने के पीछे यह विश्वास ही है कि वह शक्ति ही उसे जीवित रखे है। हम कृतज्ञ भाव से उस परम शक्ति (ईश्वर) का सम्मान करते हैं, उसके प्रति अपना आदर भाव व्यक्त करते हैं। शक्ति (ईश्वर) का होना यह मानना आवश्यक क्यों है क्योंकि हम ऐसी ही किसी शक्ति के सहारे अथवा उसके द्वारा ही जीवित हैं, हमारे शरीर में उसी परम शक्ति की शक्ति का थोड़ा अंश है। मनुष्य यह सोंचता है कि कोई ऐसी शक्ति है जो उसकी रक्षा कर रही है , जिसके कारण ही उसका आस्तित्व है , जो संकट पड़ने पर उसका मनोबल बढाती है और अदृश्य रूप से उसके साथ है। यदि मनुष्य यह मान लेता है अथवा अहसास करता है कि वही परम शक्ति का अंश शक्ति स्वरुप उसका सबसे सन्निकट कोई अपना है, उसके अतिरिक्त कोई दूसरा नही है जिसके कारण वह जीवित है या उसका जीवन है। ऐसा जीवनपर्यन्त एक अटूट सम्बन्ध एवं एक सच्चा रिश्ता यही पूर्ण विश्वास और अपनापन ही उसे जीवन में अभय प्रदान करता है तथा वह आश्वस्त हो जाता है। इसी विश्वास के साथ संतोष रखते हुए वह आनन्दित रह पाता है। यही विश्वास ही सभी के प्रति अपनापन, प्रेम की भावना जागृत करता है और वह अपने जीवन के सभी कार्यों को कर पाता है। यही ईश्वर की उपयोगिता है।

इसी कारण से सभी उस आलौकिक शक्ति(ईश्वर) को पूजते, भजते और उसका वर्णन अपने-अपने प्रकार से करते हैं। कोई उसे रूप देकर साकार भजता है, कोई निराकार भजता है, कोई शूक्ष्म अथवा कोई विशाल रूप में भजता है, कोई उसे परमपिता तो कोई उसे परमगुरू, कोई उसे सखा भाव से तो कोई उसे दास बनकर स्वामी के रूप में, कोई उसे पति के रूप में अथवा अन्य किसी प्रकार से परिभाषित कर भजता है और अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता है। ऐसी कृतज्ञता का भाव होना आवश्यक क्यों है यदि हम इस पर विचार करें तो इसे एक उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं कि यदि मानव निर्मित कोई वस्तु जिसको उस जैसी शक्ति (मानव) ने निर्मित किया है, उसके प्रति कृतज्ञ नही है तो उस निर्मित करने वाली शक्ति (मानव) का क्या मोल अथवा उसके होने न होने का कैसा प्रश्न ? परन्तु फिर भी यह सत्य है कि उस वस्तु को निर्मित करने वाली वह शक्ति (मानव) ही है जिसके द्वारा वह निर्मित है।
प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में जो भी घटित होता है अथवा व्यक्ति स्वयं अपनी बुद्धि और विवेक तथा दूसरों से सीख कर जो अर्जित करता है अथवा स्वतः भी कुछ प्राप्त करता है तो उसके पीछे भी उसी शक्ति का ही होना व्यक्त करता है क्योंकि उस शक्ति के बिना वह जीवित कैसे रहता और वह यह सब कैसे प्राप्त कर पाता अथवा उसे प्राप्त होता। जीवनकाल के अन्तर्गत ही जाने अथवा अनजाने में होने वाले सारे कार्य उसी शक्ति के द्वारा ही तो होते हैं या यों कहें कि इसी शक्ति के अन्तर्गत ही होते हैं। जीवन प्राप्त करने से पूर्व अथवा जीवन के उपरान्त भी यह परम शक्ति ही शेष रहती होगी जिसका कुछ अंश व्यक्ति में होता है।
अतः मनुष्य निरन्तर अपने ज्ञान के द्वारा ऐसी शक्ति को खोजने, जानने, समझने का प्रयास करता रहा है और कर रहा है। मनुष्य ऐसी ही शक्ति के सहारे जीवित रहते हुए जीवनपर्यन्त पूर्ण मनोयोग से निरन्तर उत्साहपूर्वक सारे कार्य कर पाता है। इसी कारण से शक्ति (ईश्वर) क्यों अथवा उसकी उपयोगिता क्या है, समझ में आ पाती है। इसी सक्रियता के चलते इसको समझने का थोड़ा प्रयास ही इस विषय की सार्थकता है । 


मैंने अपनी कविता हाँ मैंने प्रभु को देखा है ” | Yes i have seen the God में भी अनेक भावों के माध्यम से शक्ति (ईश्वर) के बारे में अपने विचार व्यक्त किये हैं, जिसे मैं शीघ्र ही आप सभी के लिए प्रकाशित करूँगा।  

अब यहाँ यह कहना पुनः समीचीन होगा कि इस विषय पर अनेक मत हैं। यह विषय कौतूहलपूर्ण एवं व्यापक है और इस विषय पर व्याख्या पूर्ण नहीं हो सकती है या यों कहें कि इस विषय की पूर्ण व्याख्या नहीं हो सकती है। फिर भी थोड़ा समझने का प्रयास ही इस विषय को सार्थकता प्रदान करता है। आइये धीरे-धीरे आगे के विषयों को भी हम आप समझने का प्रयास करते है।   

    

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top