Aao ab man ki ker lein | Let’s make up our mind

“आओ अब मन की कर लें “

बहुत हुआ अब भागमभाग,
बहुत हुआ अब दौड़ लगाना,
आओ अब मन की कर लें, आओ अब मन की कर लें। 

( अज्ञान )

दौड़ा था मैं इस जग में,
अपने मन की करने को। 
करता था जब मेरा भी मन,
आगे-आगे चलने को। 
न थकता था, न रुकता था,
न डरता था, कभी किसी को। 
सोंचा करता था मैं भी की,
मैं  हो जाऊं  सबसे आगे।  
कभी वो आगे, कभी मैं आगे,
ऐसे करते समय ये भागे। 
दौड़ ये चलती रहती मित्रों,
अब मैं पीछे, वो है आगे। 
अज्ञानी सा मैं भी भागा,
मन मेरा ये सब जाने। 
कौन है आगे, कौन है पीछे,
समय है मित्रों सब जाने। 
करी न मन की मैंने जग में,
पर अब ठान ली मैंने मन में। 
बहुत हुआ अब भागमभाग,
बहुत हुआ अब दौड़ लगाना,
आओ अब मन की कर लें, आओ अब मन की कर लें। 

( ज्ञान )

आया था मैं जिस मकसद से,
मैं वो मकसद भूल गया। 
औरों को देखा, मैं भी दौड़ा,
जैसे समझा, जीना मैं भी सीख गया। 
न ये जीवन, न ये मकसद,
है मित्रों इन्सानों का। 
यह तो मकसद जीने हेतु,
साधारण प्रतियोगी का। 
बहुत हुआ अब भागमभाग,
बहुत हुआ अब दौड़ लगाना,
आओ अब मन की कर लें, आओ अब मन की कर लें। 

( प्रकाश )

नया दिवस और नया सबेरा,
नया सूर्य उग आया है। 
उठी हैं मन में नई तरंगें,
मन मेरा हर्षाया है। 
करता था मन, कर लूँ मन की,
पर पहले सकुचाता था। 
अब तो जैसे मन की करने को,
मन ही मेरा उकसाता था। 
बहुत हुआ अब भागमभाग,
बहुत हुआ अब दौड़ लगाना,
आओ अब मन की कर लें, आओ अब मन की कर लें। 

( कर्म )

तोड़े सारे झूठे बन्धन,
सपने अब पूरे कर लें। 
नहीं मिलेगा ऐसा जीवन,
काम सभी पूरे कर लें। 
पंछी सा उड़ लें नभ में,
निर्मल जल सा बह लें हम। 
खुशबू  सा फैलें इस जग में,
फूलों सा सुन्दर बन लें हम। 
बहुत हुआ अब भागमभाग,
बहुत हुआ अब दौड़ लगाना,
आओ अब मन की कर लें, आओ अब मन की कर लें। 

( सार्थकता )

सार्थक कर लें जीवन अपना,
अच्छे-सच्चे काम करें। 
बुरे व्यसन और बुरे वचन,
इन सबका अब त्याग करें। 
करें  कमाई ऐसी मित्रों,
खुशियों का भण्डार भरें। 
मानव सेवा सच्ची सेवा,
इसको हम स्वीकार करें। 
बहुत हुआ अब भागमभाग,
बहुत हुआ अब दौड़ लगाना,
आओ अब मन की कर लें, आओ अब मन की कर लें। 

( परिणाम )

काहे इतनी जुगत लगाई,
काहे ऐसी करी कमाई। 
काम न आये धन सम्पत्ति,
काम न आये एक भी पाई। 
न ही रिश्वत चलती ऊपर,
न ही पहले सुनवाई होती। 
न ही कोई धर्म है होता,
न ही कोई ऊँचा-नीचा। 
न ही जुगत है चलती मित्रों,
बस कर्मों का लेखा होता। 
बहुत हुआ अब भागमभाग,
बहुत हुआ अब दौड़ लगाना,
आओ अब मन की कर लें, आओ अब मन की कर लें। 

( यथार्थ )

क्या लाये थे साथ में अपने,
क्या लेकर हम जायेंगे। 
यहीं रहेगा सब कुछ मित्रों,
बन्धन सब छुट जायेंगे। 
ज्योति के संग  “कर्म की पूँजी “,
संग लेकर हम आये थे,
ज्योति के संग  “कर्म कमाई “,
साथ में लेकर जायेंगे। 
बहुत हुआ अब भागमभाग,
बहुत हुआ अब दौड़ लगाना,
आओ अब मन की कर लें, आओ अब मन की कर लें। 

 

 

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