kya ishwar ke anusaar hi sab hota hai ? | Is everything according to God?

क्या ईश्वर के अनुसार ही सब होता है ? ( Is everything according to God?)

क्या ईश्वर के अनुसार ही सब होता है या यों कहें कि क्या सब ईश्वर की इच्छा से ही होता है ? जैसा कि हम सभी पढ़ते और सुनते आये हैं कि जो भी होता है वह सब ईश्वर की ही इच्छा से होता है। इस तथ्य पर मेरे स्वयं समझने के प्रयास के परिणाम स्वरुप ही यह लेख है।  इस लेख का मानव मूल्यों के उत्थान में कहीं न कहीं अवश्य स्थान होगा, ऐसा मेरा मानना है। 


क्या ईश्वर के अनुसार ही सब होता है ? ( Is everything according to God?)

जैसा कि पूर्व के लेख ईश्वर कौन हैं ?……… में मेरे विचारों से आप परिचित हुए थे जिसमें  मैंने ईश्वर कौन हैं, उनका स्वरुप कैसा है, वो करते क्या हैं और उनकी उपयोगिता क्या है ?, के बारे में अपने विचार व्यक्त किये थे कि किसी ‘शक्ति’ के कारण ही हम जीवित रहते हैं, इसी शक्ति के आभाव में हम जीवित नहीं रहते। इसी सूक्ष्म शक्ति को विस्तृत रूप में परम शक्ति (ईश्वर) कहते हैं, तब यह मानना सही है कि इसी परम शक्ति की सूक्ष्म शक्ति के बिना हम जीवित न रह पाते और जीवनकाल के सारे कार्य नही कर पाते। कहने का तात्पर्य केवल इतना ही है  कि ऐसी ही किसी शक्ति के सहारे या ऐसी ही शक्ति के अनुसार अथवा ऐसी ही शक्ति की इच्छा से ही तो हम जीवित रहते हैं और जीवनकाल में सारे कार्य कर पाते हैं। विस्तृत रूप में कहें तो इसी परम शक्ति (ईश्वर) के अनुसार या उसी शक्ति की इच्छा से ही तो सारे कार्य होते हैं फिर चाहे वह मनुष्य का जीवन और उसके जीवनकाल के सारे कार्य अथवा समस्त सृष्टि और सृष्टि जगत के सारे कार्य, वे सब उसी शक्ति की इच्छा से या उसके अनुसार ही तो होते हैं, ऐसा मेरा मानना है। इस सम्बन्ध में अनेक तत्वदर्शी आध्यात्मिक मनीषियों द्वारा यह कहा गया है कि ईश्वर की इच्छा के बिना एक पत्ता भी नही हिल सकता है अर्थात ईश्वर की इच्छा से ही सब कुछ होता है। 


अब प्रश्न यह है कि तब क्या मनुष्य सारे कार्य अपनी इच्छा से करता है या उसके सारे कार्य ईश्वर की इच्छा से होते हैं ? :- जैसा कि हमने विचार किया कि मनुष्य का जीवन और उसके जीवनकाल के सारे कार्य उसी शक्ति (ईश्वर) की इच्छा से या उसके अनुसार ही होते हैं, तो अब यहाँ यह कैसा प्रश्न कि तब क्या मनुष्य सारे कार्य अपनी इच्छा से करता है या उसके सारे कार्य ईश्वर की इच्छा से होते हैं ? परन्तु इस प्रकार के प्रश्न के उठने का भी कारण यह है कि हम इस प्रकार के प्रश्न के बारे में पढ़ते या सुनते हैं। ऐसे प्रश्न का उत्तर खोजने/जानने के पीछे मेरा कारण यह था कि पूर्व के लेखों में मैंने उल्लेख किया था कि मनुष्य ईश्वर की विशिष्ट रचना है और उसका बौद्धिक स्तर श्रेष्ठ है।  तब यहाँ यह भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि फिर आखिर क्यों मनुष्य ईश्वर की विशिष्ट रचना है और उसका बौद्धिक स्तर श्रेष्ठ है, जब उसके द्वारा किये गए सारे कार्य भी ईश्वर की इच्छा से ही होते हैं। 
इस प्रश्न के उत्तर में मेरे अंतर्मन में एक बात अवश्य उठती है कि यदि मनुष्य ईश्वर की विशिष्ट रचना है और उसका बौद्धिक स्तर श्रेष्ठ है तो अवश्य ही उसके द्वारा किये गए सारे कार्य उसकी स्वयं की इच्छा से होते हैं अर्थात उसके द्वारा स्वयं ही किये जाते हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि इसमें ईश्वर की इच्छा का होना या न होना अनिवार्य नहीं है। 
यहाँ पर मनुष्य ईश्वर की विशिष्ट रचना होने और उसका बौद्धिक स्तर श्रेष्ठ होने के बारे में कहने के अर्थ को खोजने पर यह दृष्टिगत होता है कि शायद केवल मनुष्य ही ईश्वर की ऐसी विशिष्ट रचना है जिसका बौद्धिक स्तर इतना श्रेष्ठ है कि वह प्रकृति/शक्ति के रहस्यों को समझने का और उसको अपने अनुकूल बनाने का प्रयास कर सकता है और करता है, कोई दूसरा नही। यदि ऐसा ही है तो यह जान पड़ता है कि मनुष्य द्वारा जो भी कार्य किये जा रहे हैं, वे उसके स्वयं की बुद्धि और विवेक के द्वारा ही किये जा रहे हैं। इसमें शायद ईश्वर की इच्छा का होना नहीं जान पड़ता है। तब क्या यह भी सही है कि जो भी कार्य मनुष्य द्वारा किये जाते हैं वो वह स्वयं अपनी इच्छा से करता है, ईश्वर की इच्छा से नहीं। जहाँ तक मेरा मानना है कि यह भी ठीक/सही है कि मनुष्य द्वारा जो भी कार्य किये जाते हैं तो वह उसकी स्वयं की इच्छा से या उसके स्वयं के द्वारा ही किये जाते हैं। 
तब ऐसे में दोनों बातों के उत्तर उचित होने की स्थिति में निष्कर्ष क्या निकलता है कि ऐसे प्रश्नों के उत्तरों में दोनों विरोधाभाषी उत्तर सही कैसे हो सकते हैं ?
इस पर जहाँ तक मेरा यह विचार है कि जाने/अनजाने में उचित या अनुचित सारे कार्यों को श्रेष्ठ बौद्धिक स्तर होने के कारण मनुष्य स्वयं करता है। वह अपनी बुद्धि और विवेक के द्वारा स्वयं ही सारे कार्यो को करता है जैसा कि हम प्रायः देखते हैं। परन्तु मनुष्य द्वारा किये जा रहे कार्यो पर व्यापक दृष्टि डालने पर यह प्रतीत होता है कि मनुष्य द्वारा किये गए सारे कार्य भी अंततः उसी शक्ति के सहारे या उसी शक्ति के अंतर्गत ही तो होते हैं अर्थात उसी शक्ति के द्वारा अथवा उसकी इच्छा के अनुसार ही तो होते हैं जो उसको जीवित रखती है। मनुष्य अपने जीवनकाल में जो अपनी बुद्धि और विवेक द्वारा सारे कार्य कर पाता है वह उसी शक्ति अर्थात ईश्वर के द्वारा ही कर पाता है। इस प्रकार दोनों प्रश्नों के उत्तर ठीक/सही जान पड़ते हैं।


इस सम्बन्ध में मैंने अपनी कविता “सोंचो कि क्या करना था हमको” | Think what we had to do में अपने विचार रखे हैं, जो आप सभी के लिए शीघ्र ही प्रकाशित करने का प्रयास करूँगा। इस लेख को लिखने का कारण मेरे द्वारा यह समझना ही है कि क्या मनुष्य सारे कार्य अपनी इच्छा से करता है। साथ ही क्या ईश्वर की ही इच्छा से सब कुछ होता है और यदि दोनों बातें सही हैं तो इन दोनों बातों के उत्तर में कहीं दोनों में गहरा सम्बन्ध जान पड़ता है, शक्ति अर्थात ईश्वर का मनुष्य के साथ। इसी सम्बन्ध को विस्तृत रूप से समझने के मेरे द्वारा किये गए प्रयास का प्रतिफल ही आगे का लेख होगा और यह मानव मूल्यों के उत्थान में अपना अहम् स्थान रखेगा ऐसा मेरा मानना है, जिसे हम आप सभी के लिए शीघ्र प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे। 
इस लेख के बारे में पुनः मेरा यह कहना है कि ये मेरे स्वयं के विचार हैं। इन विचारों की किसी अन्य के श्रेष्ठ/अमूल्य विचारों से कदापि तुलना नहीं की जा सकती है परन्तु आशा करता हूँ कि शायद मेरे ये विचार आप सभी को पसन्द आएंगे और मानव मूल्यों के उत्थान के लिए मेरे द्वारा किये जा रहे प्रयास में कहीं न कहीं इन विचारों का अवश्य योगदान होगा/रहेगा। 
धन्यवाद।  

 

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