” सोंचो कि क्या करना था हमको “
(Think what we had to do)
सोंचो कि क्या करना था हमको ,
और क्या हम करते आये हैं ।
सोंचो कि क्या मिलना था हमको ,
और क्या हम अब तक पाये हैं ।
हमने अपनी अक्ल लगायी ,
फिर भी अक्ल काम न आयी ।
सोंचा था जैसा, वैसा ना पाया ,
व्यर्थ हुआ सब अक्ल लगाना ।
हमने अपनी जुगत लगाई ,
फिर भी जुगत काम ना आयी ।
चाहा था जैसा, वैसा ना पाया ,
व्यर्थ हुआ सब जुगत लगाना ।
होशियारी भी हमने कर ली ,
चालांकी भी हमने कर ली ,
औरों से भी हमने पूँछा ,
पुस्तक से भी ज्ञान लिया ।
फिर भी वह ना पाया हमने ,
हमको जो पाना था अब तक ,
फिर भी वह न हो पाया ,
होना था जो वह अब तक ।
करते आये अपने मन की ,
फिर भी वह ना हो पाया ।
सोंचा था जैसा भी हमने ,
वैसा अब तक ना पाया ।
व्यर्थ गया सब समय हमारा ,
व्यर्थ गया सब मेरा काज ।
ना ही वैसा कर पाया मैं ,
ना ही पूरी मन की आस ।
कहाँ गलत था, मैं न जानूँ ,
क्या न समझा, मैं न जानूँ ।
ये जो सारे काम हुए ,
क्या ये मेरी मर्जी से ।
ये जो पाया मैंने अब तक ,
क्या ये मेरी मर्जी से ।
मैं जो करता वह न होता ,
कौन करे फिर, जो मैं न करता ।
आखिर मर्जी चलती किसकी ,
किसका ये अधिकार चले ।
समझ न पाया मैं तो अब तक ,
मन ही मन ये द्वन्द चले ।
जब होता न अपने मन का ,
सब होता है उसके मन का ,
फिर क्यों मैं पागल हूँ यारों ,
काम करूँ फिर अपने मन का ।
सब होता जब उसके मन से ,
फिर क्यों मैं अपने मन की करता ।
जो चाहे वो, वह ही होता ,
फिर क्यों दुःख मैं मन में करता ।
छोड़ों सारे झंझट मित्रों ,
बस सौंपो तुम उनको काम ।
मन हो जाए मंदिर जैसा ,
हो जायेगा जग में नाम ।
जीवन सुन्दर हो जायेगा ,
हो जोओगे तुम फिर ख़ास ।
उन पर तुम कर लो विश्वास ,
हो जाएगी पूरी आस ।
सोंचो कि क्या करना था हमको ,
और क्या हम करते आये हैं ।
सोंचो कि क्या मिलना था हमको ,
और क्या हम अब तक पाये हैं ।