मनुष्य ईश्वर की विशिष्ट रचना क्यों है ?(Why is man a specific creation of God?)
जैसा कि पूर्व के लेखों में मेरे द्वारा यह विचार किया गया कि यह सर्व विदित है कि समस्त ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी दृश्य या अदृश्य रचना है वह एक सर्व शक्ति के द्वारा ही निर्मित है। इस विषय पर सभी सहमत होंगें कि कोई ना कोई शक्ति है जिसे हम सभी विभिन्न नाम देकर यथा -ईश्वर , अल्लाह, God आदि से सम्बोधित करते हैं। वैज्ञानिक भी ऐसी शक्ति का अहसास करते हैं। पूरे ब्रह्माण्ड में अब तक ज्ञात ग्रहों में जीवन और जीव केवल पृथ्वी पर ही हैं परन्तु शायद किसी अज्ञात ग्रह पर भी जीवन और जीव हो सकते हैं , ऐसा वैज्ञानिक आदि मानते हैं लेकिन यहाँ अभी हम केवल पृथ्वी पर जीवन और जीव की ही चर्चा करते हैं। अनेक पौराणिक ग्रंथों में इस पृथ्वी के बारे में कहा गया है कि यह ”मृत्यु लोक ”है अर्थात जिसका जन्म अथवा उत्पत्ति हुई है उसकी मृत्यु अथवा अंत होना निश्चित है। उस परम शक्ति द्वारा ऐसा नियम इस लोक के लिए निर्धारित है। उस शक्ति द्वारा किसी विशेष प्रयोजन, प्रयोग अथवा उदाहरणार्थ जीव बनाये गए हैं। जीव कई तरह के बनाये गए हैं, उनमें से ईश्वर की एक रचना मनुष्य भी है। ईश्वर की प्रत्येक रचना अपने में एक विशिष्ट गुण लिए है और इसी कारण से वह दूसरी रचना से भिन्न है। यदि प्राणियों की बात करते हैं तो प्रत्येक प्राणी में अपना-अपना बौद्धिक स्तर होता है और उसी बौद्धिक स्तर के अनुसार ही वह अपने जीवनकाल के सारे कार्य कर पाता है। परन्तु हम यहाँ पर केवल मनुष्य की चर्चा करते हैं।
मनुष्य ईश्वर की विशिष्ट रचना क्यों है ?, इस सम्बन्ध में मैंने पूर्व में विचार व्यक्त किया था कि शायद केवल मनुष्य ही ईश्वर की ऐसी विशिष्ट रचना है जिसका बौद्धिक स्तर इतना श्रेष्ठ है कि वह प्रकृति /शक्ति के रहस्यों को समझने का और उसको अपने अनुकूल बनाने का प्रयास कर सकता है और करता है, कोई दूसरा नही।
मनुष्य इसी श्रेष्ठ बौद्धिक स्तर से उचित या अनुचित का विचार कर कार्यों को कर सकता है तथा अपने जीवन को सही दिशा देकर स्वयं तथा सम्पूर्ण मानव जाति एवं सभी के लिए उपयोगी बना सकता है। ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जिन्होंने दुर्बल, निर्धन अथवा शक्तिहीन होते हुए भी अपने कर्मों के द्वारा अपनी दुर्बलता, निर्धनता दूर की है अथवा शक्ति प्राप्त की है, ये सभी कार्य वह श्रेष्ठ बौद्धिक स्तर होने के कारण ही कर पाया है।
अब हम यह विचार करते हैं कि मनुष्य अपने जीवन को सार्थक और सभी के लिए उपयोगी कैसे बना सकता है ? यह कैसे सम्भव होगा कि प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में उचित एवं सबके लिए उपयोगी कार्यों को करे तथा अपने अमूल्य जीवन को स्वयं तथा सम्पूर्ण मानव जाति एवं सभी के लिए उपयोगी बना सकें? इस पर मेरे द्वारा पूर्व के लेख क्या ईश्वर के अनुसार ही सब होता है ?, के अंत में मैंने यह भी विचार किया था कि कहीं न कहीं ईश्वर और मनुष्य में गहरा सम्बन्ध है। इस सृष्टि जगत को ठीक से समझने पर यह ऐसा लगता है कि शक्ति अर्थात ईश्वर के अंतर्गत हो रहे कार्य नियमानुसार ही हो रहे हैं। जहाँ जो सभी के लिए उपयोगी /अनुकूल नहीं प्रतीत होता है उसे मनुष्य अपने श्रेष्ठ बुद्धि कौशल से सभी के लिए उपयोगी /अनुकूल बनाने का प्रयास कर रहा है।
अब यहाँ एक प्रश्न उठता है कि यदि मनुष्य द्वारा उचित /अनुचित को ध्यान में रखते हुए सभी के लिए उपयोगी सारे कार्य हो रहे हैं तो फिर मानव मूल्यों में लगातार पतन क्यों दिखाई दे रहा है और ऐसा क्यों प्रतीत हो रहा है कि मनुष्य जाने /अनजाने में उचित /अनुचित, सभी के लिए उपयोगी है अथवा नहीं ,का विचार किये बिना ही कार्यों को कर रहा है और अपना अमूल्य जीवन जो एक न एक दिन नष्ट हो ही जायेगा , पर विचार किये बगैर ही कार्यों को कर रहा है ? इसका उत्तर खोजने पर यह ज्ञात होता है कि उचित ज्ञान और नियम पालन के अभाव में श्रेष्ठ बौद्धिक स्तर होने के बावजूद भी मनुष्य अज्ञानता वश या अल्प ज्ञान अथवा उचित ज्ञान न होने के कारण अथवा तात्कालिक स्वार्थवश अनुचित तथा अनुपयोगी कार्यों को कर रहा है और अपने अमूल्य मनुष्य जीवन को व्यर्थ में गवाँ रहा है। क्या इसके लिए कोई प्रयास नहीं होना चाहिए ? क्या ऐसा कोई उपाय हो सकता है कि मनुष्य ऐसे अनियमित , अनुपयोगी , समाज के लिए अनुचित कार्यों को न करे , अपने अमूल्य जीवन को व्यर्थ में न गंवाए ? इस हेतु प्रयास किया जा सकता है और शायद काफी हद तक इसे उचित ज्ञान और नियम पालन के आधार पर करना सम्भव हो सकता है। तब इस पर विचार करें कि कौन से या किस प्रकार के कार्य किये जाएँ कि ऐसा काफी हद तक सम्भव हो सके।
प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन को सार्थक बनाने , सम्पूर्ण मानव जाति अथवा सभी के लिए उपयोगी कार्यों को करने के बारे में विचार करना होगा और यह अनिवार्य रुप से करना होगा। ऐसा करना अनिवार्य क्यों है इस पर भी विचार करने पर यह ज्ञात होता है कि मनुष्य के द्वारा जो भी अच्छे या बुरे कार्य किये जाते हैं वो सारे परम शक्ति (ईश्वर ) के सूक्ष्म अंश के द्वारा ही तो किये जाते हैं और इस पर व्यापक रूप से दृष्टि डालने पर यह प्रतीत होता है कि स्वयं परम शक्ति (ईश्वर ) द्वारा किये गए प्रत्येक कार्य नियमानुसार , सभी के लिए उपयोगी अथवा उचित होते हुए ही जान पड़ते हैं। वायु का होना , जल का होना , वर्षा का होना ,पेड़ -पौधों का होना , फलों का होना आदि -आदि सभी के लिए ही तो हैं। तब मनुष्य द्वारा भी जो कार्य किये जाएँ तो वो भी तो सभी के लिए उपयोगी ही होने चाहिए। यदि वह अनुपयोगी /अनुचित और अनियमित कार्य करता है तो उसके वो कार्य उस शक्ति जो उसको संचालित कर रही है अर्थात ईश्वर के नियमों के विपरीत ही तो होंगे। तब उसे इस पर अवश्य ही विचार करना होगा कि वह भी ऐसे अनुपयोगी , अनुचित और अनियमित कार्यों को क्यों करे जब स्वयं परम शक्ति (ईश्वर ) उन कार्यों को नहीं करता। मैंने उस शक्ति और मनुष्य के बीच के इसी गहरे सम्बन्ध के बारे में पूर्व के लेख में विचार किया था। शायद परम शक्ति (ईश्वर ) द्वारा मनुष्य को बनाने के पीछे भी यही कारण रहा होगा कि ऐसे अनेक कार्य जो स्वयं परम शक्ति (ईश्वर ) को न करना पड़े वह उसकी विशिष्ट रचना सूक्ष्म शक्ति मनुष्य ही उसे करे और यदि मनुष्य ऐसा नहीं करता है तो अंततः स्वयं ऐसे कार्य उस परम शक्ति (ईश्वर ) को करना पड़ता है या वो करते हैं। भारत में प्रसिद्ध धार्मिक पुस्तक ”गीता ” में भी श्रीकृष्ण ने इसी बात का सन्देश दिया है कि –”यदा -यदा हि धर्मस्य…………… अर्थात जब -जब धर्म की हानि होगी ,अधर्म बढ़ेगा तब -तब मैं पृथ्वी पर अधर्म का नाश करने और धर्म की स्थापना हेतु जन्म लूँगा अर्थात मैं आऊँगा। इस कथन को लोगों ने शायद हज़ारों वर्ष व्यतीत जाने के कारण भुला दिया। जिसे मैंने अपनी कविता ”मैं आऊँगा ” में एक बार पुनः याद दिलाने हेतु उनके सन्देश को उनकी ही वाणी में समझाते हुए प्रस्तुत किया है ,जिसे मैं आप सभी के लिए शीघ्र प्रकाशित करूँगा।
हम सभी ने पढ़ा और सुना होगा कि ऐसे अनेक महापुरुष हुए हैं जिन्होंने मनुष्य रूप में ऐसे कार्य किये हैं जिन्हें परम शक्ति (ईश्वर ) के रुप में माना /जाना जाता है।
यदि मनुष्य जिसका बौद्धिक स्तर श्रेष्ठ है , इस पर विचार करें तो इसी श्रेष्ठ बौद्धिक स्तर से वह अपने जीवन को सार्थक बना सकता है और जीवन की पूर्णता को प्राप्त कर सकता है तथा ईश्वर की विशिष्ट रचना होने का प्रमाण दे सकता है।
पूर्व काल के बारे में सुनने और पढ़ने पर यह ज्ञात होता है कि अनेक ऐसे महापुरुष/मनीषी हुए हैं जिनके द्वारा इस पर विचार करते हुए मनुष्य के जीवन को सार्थक बनाने के लिए अपने विचार या नियम प्रस्तुत किये गएँ हैं जिनकी सही जानकारी प्राप्त कर तथा उन पर अमल करके अनेक व्यक्तियों के द्वारा ऐसा किया गया है। विभिन्न भाषाओं के अनेक ग्रंथों में भी लेख, कहानी, काव्य आदि -आदि के द्वारा ऐसा प्रयास किया गया है। ऐसी अनेक संस्थाए भी इसी प्रकार का कार्य कर रही हैं, जिनको भी यदि मनुष्य समझने /जानने का प्रयास करे और उन्हें आत्मसात करते हुए कार्यों को करे तो वह ऐसा कर सकता है।
सुनने, देखने और समझने पर विश्व में ऐसे कई नाम आपको मिलेंगे जिनके द्वारा ऐसा किया गया है। इस प्रकार श्रेष्ठ बौद्धिक स्तर का उपयोग कर उचित विचार एवं नियमों का पालन करते हुए यदि मनुष्य अपने मन, वाणी, कर्म, क्रोध, लोभ, काम, मोह आदि को अपनी इन्द्रियों के द्वारा नियंत्रित रख कर विवेक, धैर्य, सहनशीलता, आलस्य त्याग, दया, करुणा, प्रेम आदि का पालन-पोषण प्रारम्भ कर दे तो वह मानव से महामानव बन सकता है। “भारत” में हिन्दू धर्म में मनुष्य रूप में अवतरित सभी “राम “ को ईश्वर मानते हैं, उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हैं अर्थात उन्होंने अपने जीवन में सभी मर्यादाओं का पूर्ण पालन किया और इसका पालन करने का सन्देश हमें प्रदान किया। इसी प्रकार मनुष्य रुप में अवतरित “कृष्ण “ ने अपने जीवन में कर्म में लिप्त न होकर या बिना कर्मफल की इच्छा के अर्थात निष्काम कर्म करने का सन्देश हम सभी को दिया। प्रसिद्ध धार्मिक पुस्तक “गीता “ में उन्होंने इसी प्रकार के कर्मों अर्थात निष्काम कर्मों का सन्देश हमें प्रदान किया, जिसका वर्णन मैंने ऊपर भी किया है। इस प्रकार यदि मनुष्य मर्यादाओं का पालन करते हुए निष्काम कर्म करता है तो वह भी ईश्वर की विशिष्ट रचना क्यों है यह सिद्ध कर सकता है। यह तभी संभव है जब वह उपरोक्त वर्णित बातों की गंभीरता को स्वीकार कर उनका पालन अनिवार्य रूप से करे, ऐसा करने पर वह मानव से महामानव बन सकता है, इसमें कोई संदेह नहीं है और इस प्रकार अपने मनुष्य होने की विशिष्टता को सिद्ध कर सकता है एवं मानवता की रक्षा कर सकता है और अपने जीवन की पूर्णता को प्राप्त कर सकता है।
पुनः इस पर मेरा यह विचार है कि मनुष्य द्वारा ऐसे उपयोगी, उचित और नियमित कार्य मेरे द्वारा पूर्व में विचार किये गए नियम जानना, मानना और उस पर अमल करना या उसको करना, के नियम पर अनिवार्य रूप से चल कर ही किये जा सकते हैं। जिसमें हमने यह उल्लेख किया था कि प्रत्येक व्यक्ति बहुत कुछ जानता है, परन्तु मानता नही है और यदि मान भी गया तो उस पर अमल नही करता है अर्थात उसको करता नही है। इस प्रकार यहाँ तीनों में से किसी एक बात के न होने पर सारी बात ही व्यर्थ हो जाती है जबकि यह अत्यन्त अनिवार्य है। इसलिए उसे यह गम्भीरतापूर्वक विचार करना होगा कि यदि उसे कोई उपयोगी बात पता हो या किसी के द्वारा बतायी जाये तो उसको अवश्य जानना, मानना और उस पर अमल करना चाहिए।
मनुष्य को अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए ऐसे कार्य जो सभी के लिए उपयोगी ,उचित और नियमित हों , को करने पर ही अपने जीवन, जो एक न एक दिन नष्ट हो ही जायेगा, की पूर्णता प्राप्त हो सकती है तथा उसके जीवन के कालखण्ड में उसके द्वारा किये गए कार्य सभी के लिए उपयोगी हो सकते हैं और तभी वह अपने जीवन से सन्तुष्टि का अनुभव करेगा तथा समाज के लिए उसका जीवन अनुकरणीय तथा प्रेरणादायक होगा और मानवता की रक्षा हो सकेगी।
पुनः यहाँ यह कहना है कि प्राचीन समय से मनुष्य जीवन के लिए अनेक शास्त्रों में ऐसे कई नियमों /कर्तव्यों के उल्लेख हैं जिन पर चल कर मनुष्य अपने जीवन को सार्थक बनाता रहा है। ऐसे कई नियमों /कर्तव्यों पर यदि अनिवार्य रूप से विचार करे तो वर्तमान में भी इनका पालन कर वह ऐसा कर सकता है। मनुष्य को उसके जीवन की पूर्णता प्राप्त करने के लिए ऐसे कई नियमों /कर्तव्यों का पालन करना अनिवार्य होता ही है जिन पर हम आगे विचार करेंगे।
मैं पुनः यह कहूँगा कि ये मेरे स्वयं के विचार हैं। मेरे इन विचारों की किसी अन्य के अमूल्य विचारों से कदापि तुलना नही की जा सकती है परन्तु आशा करता हूँ कि मेरा यह लेख आप सभी को अवश्य पसन्द आएगा और शायद यह मानव मूल्यों के उत्थान में मेरे द्वारा किये जा रहे प्रयास में पहले कदम के रूप में कहीं न कहीं अवश्य उपयोगी होगा।
धन्यवाद।